Friday, 1 May 2020

‘कोई तब तक नहीं मरता, जब तक हम उसे याद करते रहते हैं’

ऋषि कपूर का अचानक चला जाना सबको अखर गया। एक ऐसा कलाकार जो अंतिम सांस तक डॉक्टरों को हंसाता रहा और जो चाहता था कि उन्हें हंसते हुए याद किया जाए, रोते हुए नहीं


स्वर्गीय ऋषि कपूर को श्रध्दांजलि


नेहा

टी एस इलियट का एक कथन याद रहा है- ‘April is a cruellest Month.. कुछ ऐसा ही लग रहा है इन दिनों। देश में बहुत कुछ चल रहा है और उस बहुत कुछ के बीच अब ये खबर मिली कि कैंसर से पीड़ित 67 वर्षीय अभिनेता ऋषि कपूर ने 30 अप्रैल की सुबह मुंबई के एक प्राइवेट अस्पताल में अपनी अंतिम सांसें लीं और दुनिया को अलविदा कह गए। 29 अप्रैल को वह सांस लेने में परेशानी होने की वजह से ही अस्पताल में भर्ती हुए थे।

उनके दुनिया से चले जाने की खबर उनके सबसे करीबी दोस्त अमिताभ बच्चन ने ट्वीट करके दी।                 

उनका इस तरह जाना हिंदी सिनेमा की बहुत बड़ी क्षति है जिसे शायद ही कोई भ सकता है। ऋषि जी के निधन पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी संवेदना जताते हुए ट्वीट किया- “Multifaceted, endearing and lively...this was Rishi Kapoor Ji. He was a powerhouse of talent. I will always recall our interactions, even on social media. He was passionate about films and India's progress. Anguished by his demise. Condolences to his family and fans. Om Shanti.” -@narendramodi 

कई नेताओं और हस्तियों ने ऋषि कपूर के निधन की खबर सुन उन्हें याद करते हुए अपनी  संवेदनाएँ व्यक्त कीं। आइए जानते हैं ऋषि कपूर के जीवन और उनके व्यक्तित्व के बारे में

निजी जीवन


चिंटू उर्फ़ ऋषि कपूर का जन्म 4 सितंबर 1952 में मुंबई में हुआ। वहीं अपनी शुरूआती पढ़ाई की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए अजमेर चले गए। चॉकलेटी ब्वॉय कहे जाने वाले ऋषि की लव स्टोरीज़ भी कम नहीं थीं। कहा जाता है कि नीतू से शादी करने से पहले वह कई लड़कियों को डेट करते थे, फिर वह फिल्मबॉबीकी शूटिंग के दौरान डिंपल को पसंद करने लगे लेकिन डिंपल की अचानक से राजेश खन्ना से शादी ने सभी को चौंका दिया ऋषि, नीतू के साथ पहली बार साल 1974 में आयीज़हरीला इंसानफिल्म में नज़र आए थे। उस समय ऋषि 21 और नीतू 14 साल की थीं। तभी से दोनो में गहरी दोस्ती हो गई थी। इन्होंने एक साथ खेल-खेल में (1975), कभी-कभी (1976), ‘अमर अकबर एंथोनी’(1977),  दुनिया मेरी जेब में (1979) जैसी हिट फिल्मों में काम किया। इन दोनों की रोमांटिक जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया और इस जोड़े ने 22 जनवरी 1980 में शादी कर ली।          



इनकी बेटी रिधिमा कपूर और बेटे रणबीर कपूर हैं। बेटे रणबीर कपूर भी पापा ऋषि कपूर की तरह ही आज के चॉकलेटी ब्वॉ हैं। पापा ऋषि और मां नीतू के साथ रणवीर नेबेशरमफिल्म में काम किया। यह पहली और आखिरी बार था, जब यह परिवार एक साथ स्क्रीन साझा करता नज़र आया। 

व्यक्तित्व


ऋषि कपूर एक मुखर अभिनेता कहे जाते थे। मधु जैन के साथ एक इंटरव्यू  में नीतू कपूर बताती हैं कि बॉब ( ऋषि कपूर को वह इसी नाम से पुकारती थीं ) बहुत कंजूस, जलनखोर और जल्दी बुरा मान जाने वाले इंसान हैं नीतू बताती हैं कि उनकी अपने बेटे से नज़दीकी को वह पसंद करते थे। ऋषि कपूर एक अनुशासन प्रिय पिता के रूप में अपने बच्चों को बड़ा कर रहे थे ताकि वह ज़मीन से जुड़े रहें। ऋषि कपूर एक कठोर और अनुशासन प्रिय पिता के साथ परिवार को समय देने वाले इंसान भी थे। अपने चाचा शशि कपूर की ही तरह वह भी हर रविवार परिवार के लिए समय निकालते थे, भले ही वह कितने ही व्यस्त क्यों हों ! 

उनके निधन के बाद एनडटीवी से बात करते हुए फिल्म अभिनेता कबीर बेदी ने बताया- “ऋषि कपूर कमाल के कलाकार और इंसान थे। हमेशा हंसी-मज़ाक बांटना वह अच्छी तरह जानते थे और उनकी खासियत थी कि चाहे वह कितने भी बड़े स्टार हों, लेकिन उनमें ह्यूमैनिटी रही। एक डाउन टू अर्थ फिलिंग रही”।

फिल्मी कैरियर


परिवार में फिल्मी परिवेश की वजह से ऋषि कपूर की भी रुचि अभिनय में हो गई। ऋषि कपूर के अभिनय की शुरुआत पिता राजकपूर की बनाई फिल्म 'मेरा नाम जोकर’  से मानी जाती है लेकिन असल में ऋषि साल 1955 में आयी फिल्मश्री 420’ में नज़र आए थे। इस फिल्म का एक गाना हैप्यार हुआ इकरार हुआ...’ जिसमें राज कपूर और नरगिस के पीछे बारिश में चलने वाले तीन बच्चों में एक ऋषि कपूर थे। वैसे तब वह तीन साल के थे और नरगिस ने उन्हें इस शॉट को अच्छे से करने के लिए चॉकलेट का लालच दिया था और वह मान गए थे। 


ऋषि कपूर ने बतौर एक्टर साल 1973 में आई फिल्मबॉबीमें काम किया और आते ही ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की जोड़ी छा गई थी। इस किरदार के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड (1974) मिला। फिर क्या था, लवर ब्वॉय अब नैशनल स्वीटहार्ट बन गया था। साल 1973 से 2000 के बीच ऋषि कपूर ने 92 रोमांटिक फिल्मों में काम किया जिनमें से 36 फिल्में सुपरहिट साबित हुईं। इन फिल्मों मेंकर्ज़’, ‘चांदनी’, ‘सागर’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘प्रेम रोग’ और ‘हिनाजैसी फिल्में शामिल हैं। साल 2000 के बाद ऋषि कपूर सहायक भूमिका में नज़र आने लगे जैसे 'जलवा’ (2002), ‘हम तुम’, ‘फ़ना’, ‘नमस्ते लंदन’, ‘लव आजकलऔरपटियाला हाउसमें वह अपनी दूसरी पारी में नज़र आए। साथ ही कुछ अंग्रेजी  फ़िल्मों जैसे ‘डोंट स्टॉप ड्रीमिंग’ (2007) औरसांभर सालसा’ (2008) में भी उन्होंने काम कियाअग्निपथ’  में उन्होंने एक खलनायक की भूमिका निभाई, जिसे देखकर सभी दंग रह गए। इस किरदार के लिए उन्हें आईफा का बेस्ट नेगेटिव रोल का अवॉर्ड भी मिला। फिर साल 2018 में आई कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘102 नॉट आउटमें वे 27 सालों बाद अमिताभ बच्चन के साथ पर्दे पर दिखाई दिए। उसी साल आई अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्ममुल्क’ में तो उन्होंने अपने दमदार अभिनय से सबको चकित कर दिया        

ऋषि कपूर ने हमेशा अपने किरदार के साथ न्याय किया। आज भी लोग उनकी अदाकारी के दीवाने हैं। हिंदी सिनेमा को इतना कुछ देने के बाद अचानक उनका जाना सभी की आंखें नम कर गया। उनकी बेटी रिधिमा को इस बात का दुख रहेगा कि अंतिम समय में वह पिता के साथ नहीं रह पाईं। हालाँकि ऋषि कपूर इसका जवाब भी सवाल के रूप में दे गए हैं किजाने से पहले एक बार मिलना क्यों ज़रूरी होता है?' वह चाहते थे कि उन्हें आंसुओं से नहीं, बल्कि हंसकर याद किया जाए। ऐसे कलाकार मरते नहीं हैं। जॉर्ज इलियट की पंक्ति है-कोई तब तक नहीं मरता जब तक हम उसे याद करते रहते हैं  


दास्तान उस बादशाह की जिसकी तलवार ने साम्राज्य की हदों को विस्तार दिया और मजहबों को अक्ल की कसौटी पर कसा

पुस्तक समीक्षा: अकबर: लेखक- शाज़ी ज़मां 

जब इतिहास के तथ्यों और किस्सागोई के रसायन आपस में बारीक तरीके से मिलते हैं तो बनती है ऐसी क़िताब 
  • शुभम शर्मा 
"एक बादशाह जिसकी तलवार ने साम्राज्य की हदों को विस्तार दिया, जिसने मजहबों को अक्ल की कसौटी पर कसा, जिसने हुकूमत और तहजीब को नए मायने दिए, उसी बादशाह की रूहानी और सियासी जिंदगी की जद्दोजहद का संपूर्ण खाका पेश करता एक अभूतपूर्व उपन्यास"- यह शब्द लिखे हैं क़िताब "अकबर" के कवर पृष्ठ पर. इस किताब के लेखक हैं शाज़ी ज़माँ जो न सिर्फ जानेमाने पत्रकार और लेखक हैं बल्कि इस क़िताब के जरिये उनके अन्दर छुपा इतिहासकार भी उभरकर सामने आ गया है. 

यह सही है कि वे एक प्रशिक्षित इतिहासकार हैं. उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातक किया है. लेकिन इस किताब में वे सिर्फ इतिहासकार भर नहीं हैं बल्कि उनका किस्सागो भी कुछ छूट लेते हुए उस दौर को फिर से जीने की कोशिश करता है. इसमें उनकी किस्सागोई का जवाब नहीं. वह बीबीसी, जी न्यूज, आज तक और स्टार न्यूज से जुड़े रहे हैं, इसके अलावा वह एबीवीपी न्यूज नेटवर्क के समूह संपादक रहे हैं. इस किताब को राजकमल प्रकाशन ने छापा है.

वैसे मेरे जैसे युवा पाठक के लिए अकबर यह नाम सुनते ही ध्यान आता है, आशुतोष गोवारिकर की फिल्म "जोधा अकबर" के रितिक रोशन अभिनीत कैरेक्टर अकबर का. वहीं पुरानी याददाश्त कुरेदने पर "मुगल-ए-आज़म" के पृथ्वीराज कपूर की आवाज कानों में गूंजती है जिनके सुडौल शरीर और भारी-गंभीर आवाज़ में हम मध्यकालीन बादशाह अकबर की छवि देखने लगते हैं. लेकिन इस किताब में अकबर की रूह खुलकर सामने आती है, लेखक ने इस किताब को लिखने के लिए अकबर पर लगभग 20 साल की रिसर्च की है, जिसे दास्तान की शक्ल में इस किताब में उतारा गया है. 

किताब के बारे में

यह किताब शुरू से शुरू नहीं होती है यानी यह किताब बादशाह अकबर के जन्म से प्रारंभ नहीं होती है, यह किताब अकबर की जिंदगी के एक बहुत ख़ास लम्हे से परवान चढ़ती है, जिस वक़्त उनपर एक कैफियत सवार थी, जिसे लेखक ने 'हालते अजीब' कहा है. 

इस किताब में शेख अबुल फजल के अकबरनामा की झलक दिखती है, तो कभी निजामुद्दीन अहमद के तबाकाते अकबरी और मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी के मुंतुखबुत्तवारीख का जिक्र आता है. लेखक ने इस किताब को लिखने के लिए मुगल वंश पर लिखी किताबों से लेकर दलपत विलास नाम तक के कई ऐतिहासिक ग्रंथों के पन्ने पलटे हैं. पन्ने दर पन्ने रहीम, तानसेन, बनारसी दास जैसे वैष्णव कवियों का भी सामना अकबर से
होता है. 

यहां एक ऐसा अकबर नजर आता है जिसे धर्मों में काफी रूचि है वह इसलिए ईसाई पादरी, जैन संतों, सूफियों सबसे दीन पर चर्चा करता है. वह निराश पादरी से कहता है कि  इस बात से खुश रहिए कि मुझसे पहले आप कभी कोई बादशाह से दूसरे धर्म की बात भी नहीं कर पाते.

किताब की भाषा 

इस उपन्यास की भाषा आज की हिंदी नहीं है. लेखक के अनुसार उन्होंने उसी भाषा में लिखा है जो अकबर की ज़बान थी, कई पन्नों में दस - ग्यारह शब्द ऐसे दिखते है जिनका अर्थ समझे बिना वाक्य नहीं समझ आता. जैसे स्वर्गीय की जगह जन्नत आशियानी या फिरदौस मकानी शब्द जानकर खुद का शब्दकोश भी विस्तृत होता है. भाषा में फारसी पुट ज्यादा है, फारसी में ट, ड और ड़ की ध्वनि नहीं है, इसलिए लेखक ने कटिज़ेब शब्द को कतिज़ेब लिखा है. इसलिए पढ़ते - पढ़ते दिमाग पर थोडा जोर देना पढ़ता है लेकिन उसके बाद यह भाषा और शाजी ज़मां की किस्सागोई आपको बाँध लेती है. 

अकबर के पहले के दौर के लिए लेखक ने हिज्री और अकबर के समय के लिए इलाही सन का इस्तेमाल किया है. ऐसा इसलिए क्योंकि बाबर और हुमायूं के समय को हिज्री सन से नापा जाता था और अकबर ने अपने समय को इलाही सन से शुरू कराया था. इस किताब में लेखक ने उसी हिसाब से तारीखें दर्ज की हैं. 

अकबर में खास

किताब में वैष्णव कवि कुम्भनदास का जिक्र आता है कि किस तरीके से अकबर को कुंभन की कविता मिलती है और वह कवि को दरबार में आने का न्यौता देते हैं. कुम्भनदास गोवर्धन में रहते हैं और बेमन से सिर्फ बादशाह के हुक्म की तामील करने पहुंच जाते हैं. जब अकबर उन्हें पद गाने बोलते है तो कुम्भनदास गाते हैं:

"भक्तन को कहाँ सीकरी सो काम।
आवत जात पन्हैया टूटी बिसर गयो हरि नाम।।
जाको मुख देखे दुख लागै ताको करन परी परवान।।
कुम्भनदास लाल गिरधर बिन यह सब झूठौ धाम।।"

जाहिर है कि इसके बाद अकबर उन्हें जाने देते हैं.

इस किताब में जब भी अकबर का वर्णन होता है तो कुछ यूं होता है-" जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के दाहिने हाथ पर बुलंद दरवाजा था जो उनकी गुजरात फतह की यादगार था, लाल पत्थर और संगमरमर के इस बुलंद दरवाजे पर कुरान की आयतें लिखी थी. किताब के पन्नों में मुगल काल के काव्य, चित्रकला और संगीत को भी संवाद की शक्ल में उतारा गया है, कुछ कविताएं जो यहां मौजूद हैं-

जैसे अकबर अपने आखिरी वक्त की तन्हाई में एक दोहा कहता है जो उसने खुद लिखा था-

"पीथल" सूँ मजलिस गई तानसेन सूँ राग
हंसबो रमिबो बोलबो गयो बीरबर साथ।

दरबार की शानो शौकत का वर्णन मियां तानसेन के शब्दों में कुछ यूं बताया गया है-

चढ़ौ चिरंजीव साह अकबर साहन साह
बादशाह तख्त बैठो छत्र फिरै निसान।
दिल्लीपति तुम नहीं जी के नायब अति सुंदर सुलतान।

चारौं देस लिये कर जोर कमान,
राजा राव, उमराव सब मानत तेरी आन।
कहे मियां तानसेन सुनियो महाजान,
तुम से तुम ही और नाहीं दूजौ गुनीं जनन के राखत मान।।

अकबर को खुद की प्रशंसा पसंद थी. उसने दीन ए इलाही के जरिए सभी धर्मों का मेल करते हुए एक नया धर्म ही बना दिया था. अकबर को खुदा के समकक्ष बताते हुए शायर कासिमे काही का यह शेर देखिए:
 
शाहे दीन अकबर मोहम्मद का ऐसा रूतबा और रोब है,
अगर कुफ्र न होता तो उन्हें दूसरा खुदा कहता।

दूसरा शेर शायर मुल्ला शेरी का:

बादशाह इस साल पैगंबरी का दावा करेंगे,
गर खुदा ने चाहा तो वो अगले साल खुदा बन जाएंगे।

बच्चों की पसंदीदा कहानियों में आज भी अकबर-बीरबल जिंदा है. जब एक बार अकबर बीमार हुए तो हकीम के नब्ज देखते हुए बीरबल की पहेली सुनाई देती है-

"कर बोले कर ही सुने श्रवण सुने नहि ताहि
कहि पहेली बीरबल सुनिए अकबर साहि‌।।" 

यह पुस्तक पढ़ते हुए अकबर रहमदिल, जालिम, ईमानपसंद, लापरवाह, बहादुर, संवेदनाहीन, सच्चा मित्र सहित परत दर परत सबसे बढ़कर एक चलता फिरता इंसान नजर आता है. बाबर की मौत के समय पुस्तकालय की सीढ़ियों की डिटेलिंग, अकबर के जनाजे के समय चोर दरवाजे का खुलना और पार्श्व में आवाज की शाही दरवाजों से बादशाह गुजरते हैं, लाश नहीं. पढ़ते हुए लगता है कि किसी फिल्म का स्क्रीनप्ले पढ़ रहे हों.

आपकी अगर अकबर में रूचि हो तो किताब सिर्फ आपके लिए है. वैसे मौका भी है जब आप इस शानदार देश को बनानेवाले एक महान बादशाह के बारे में लिखी इस दिलचस्प और अनूठी किस्सागोई की किताब को पढ़ें. यह क़िताब राजकमल प्रकाशन ने छापी है.  


( इस समीक्षा के लेखक शुभम शर्मा पर्दा, जर्दा और गर्दा के शहर भोपाल के रहनेवाले हैं और उन्हें, पढ़ना, सुनना और घूमना पसंद है.) 

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