Wednesday, 29 April 2020

एक और सितारा चमक बिखेर कर खो गया

श्रद्धांजलि: इरफ़ान खान (1967-2020) 

एक क्रिकेटर जो क्रिकेटर बनते-बनते बन गया ऐसा अभिनेता जिसके अभिनय ने हिंदी और भारतीय सिनेमा को नई उंचाई पर पहुंचा दिया  
  • अयूब अली 
एक और सितारा आज अपनी चमक बिखेर कर अचानक टूट गया और इस यूनिवर्स में खो गया. उसकी चमक से दुनिया चमत्कृत थी.     

हिंदी सिनेमा के अपने ढंग के अकेले अभिनेता इरफ़ान खान अब हमारे बीच नहीं रहे. बुधवार दोपहर मुम्बई के कोकिलेबन अस्पताल में करीब 12 बजे उन्होंने आखरी सांस ली. करीब 2 दिन पहले ही वे अस्पताल में भर्ती हुए थे. कल रात तक उनकी सेहत ठीक थी. इस बीच उनके प्रवक्ता ने बयान जारी कर ये बताया भी था कि उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ है. 

करीब 2 साल पहले न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर का पता लगने के बाद से इरफान बीमार रहने लगे थे और इसी के चलते उन्हें मेडिकल अटेंशन में रखा गया था. इरफान करीब एक साल तक लंदन में इलाज कराने के बाद पिछले साल देश लौट आए थे. इरफान बीमारी से उबरकर अपने काम पर भी लौट आए थे और फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे. उनकी आखिरी फिल्म अंग्रेजी मीडियम कुछ दिन पहले ही रिलीज हुई थी.

माँ की मृत्यु से सदमे में थे इरफ़ान

इरफान की मां सईदा बेगम का हाल ही में जयपुर में निधन हो गया था। वो 95 साल की थीं। उनका 25 अप्रैल को उम्र-संबंधी बीमारी से देहांत हो गया था। देश मे लागू लॉकडाउन की वजह से इरफान उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे। इरफ़ान ने अपनी मां को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए श्रद्धांजलि दी थी क्योंकि वो लॉकडाउन की वजह से मुंबई में थे।

शुरुआती दिन और संघर्ष

जयपुर में पैदा हुए इरफान ने बॉलीवुड में जो मुकाम हासिल किया, उसके पीछे उनकी सालों की मेहनत और काम के प्रति उनकी ईमानदारी थी। जयपुर के रंगमच से बॉलीवुड के पर्दे तक चमकने की कहानी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है। इरफान बचपन में क्रिकेटर हुआ करते थे और खूब क्रिकेट खेला करते थे। वे सीके नायडू ट्राफी में खेल चुके थे। इरफान के घर का ऐसा माहौल था कि टीवी और सिनेमा देखने की इजाजत नहीं थी। इरफ़ान क्रिकेट तो खेलते ही थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी नाटकों में भी दिलचस्पी होने लगी जिसके बाद उन्होंने कला के इस क्षेत्र में खुद पर मेहनत करना शुरू कर दिया।

वो गली-मोहल्ले में नुक्कड़ नाटक करने लगे. इरफान का ये शौक उन्हें जयपुर के रबीन्द्र मंच तक ले आया. यहाँ से वो पहुंचे दिल्ली के मशहूर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में. एनएसडी से एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने के बाद
इरफान मुंबई पहुंचे और यहां से शुरू हुआ उनका स्ट्रगल। परिवार में फिल्मी बैकग्राउंड न होने के बावजूद उनकी मेहनत न उन्हें फिल्मी पर्दे पर पहुंचा दिया। इस बीच, उन्होंने हर न मानते हुए लगातार संघर्ष किया।

एक दौर ऐसा था कि रोजी-रोटी के लिए इरफान हर तरह के किरदार करने लगे, कई टी.वी. शोज और फिल्मों में उन्होंने छोटे-छोटे रोल किए. 1990 में आई फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ में उनका एक छोटा सा रोल था जिसे लोगों ने नोटिस तो किया, लेकिन उन्हें कुछ खास सफलता नहीं मिली। इरफान ने 23 फरवरी 1995 को एनएसडी में अपनी सहपाठी रही सुतपा सिकदर से शादी की. बाबिल और अयान खान उनके बेटे हैं.

फिल्मी करियर और अभिनय की बुलन्दी पर 

इरफान की किस्मत बदली 2002 में रिलीज हुई आसिफ कपाड़िया की फिल्म ‘द वारियर’ से. इस फिल्म में इरफान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद 2003 में आई इरफान की फिल्म ‘हासिल’ और 2004 में ‘मकबूल’ रिलीज हुई. इन दोनों ही फिल्मों ने इरफान को हिंदी सिनेमा में न सिर्फ शोहरत दिलाई बल्कि उनके अभिनय के अनूठेपन ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। फ़िल्म "हासिल" के किरदार रणविजय सिंह को लोग आज भी याद करते हैं. इस फिल्म का इरफान के बॉलीवुड करियर में खास महत्व रहा। इन फिल्मों से बॉलीवुड इंडस्ट्री में इरफान खान को उनकी काबिलियत और अभिनय के चलते खूब सराहा जाने लगा और अधिक पसन्द किया जाने लगा।

साल 2003 के बाद इरफान के करियर की गाड़ी निकल पड़ी और उन्होंने बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड की फिल्मों- दी अमेजिंग स्पीडर मैन, ए माइटी हार्ट में भी अपने एक्टिंग का जलवा बिखेरा। इस दौरान उन्होंने 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'स्लमडॉग मिलेनियर', 'न्यूयॉर्क' जैसी फिल्मों में भी काम किया। उनकी फिल्मों पान सिंह तोमर, बिल्लू बारबर, पार्टीशन, नोकआउट ने एक अलग तरीके से लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। इरफान की दमदार अदाकारी के लिए उन्हें 2011 में पद्मश्री से भी नवाजा गया.

'द लंचबॉक्स', 'पीकू', 'करीब-करीब सिंगल' जैसी फिल्मों में इरफान के रोमांटिक अंदाज को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया. खासकर, 'पीकू' में दीपिका पादुकोण के साथ उनकी जोड़ी काफी हिट रही। लोगों ने इसे खूब पसंद किया। उन्होंने करीब 30 बॉलीवुड फिल्मों में काम किया था।

इरफान इरफान खान की आखिरी फिल्म 'अंग्रेजी मीडियम' 13 मार्च 2020 को रिलीज हुई थी। ये फिल्म कुछ ही दिन थिएटर में चल पाई, जिसके बाद कोरोना वायरस की वजह से थिएटर और मल्टीप्लेक्स बंद कर दिए गए थे। इसके बाद ये फिल्म हॉटस्टार जैसे OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दी गई।

बीमारी के पता चलने पर इरफान ने लिखा था ये पत्र 

'कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से जूझ रहा हूं, मेरी शब्‍दावली के लिए यह बेहद नया शब्‍द था, इसके बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि यह एक दुर्लभ कैंसर की बीमारी है और इसपर अधिक शोध नहीं हुए हैं। अभी तक मैं एक बेहद अलग खेल का हिस्‍सा था। मैं एक तेज भागती ट्रेन पर सवार था, मेरे सपने थे, योजनाएं थीं, आकांक्षाएं थीं और मैं पूरी तरह इस सब में बिजी था। तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंथे पर हाथ रखते हुए मुझे रोका। वह टीसी था: 'आपका स्‍टेशन आने वाला है, कृपया नीचे उतर जाएं। ' मैं परेशान हो गया, 'नहीं-नहीं मेरा स्‍टेशन अभी नहीं आया है.' तो उसने कहा, 'नहीं, आपका सफर यहीं तक था, 'कभी-कभी यह सफर ऐसे ही खत्‍म होता है'।

इस सब के बीच मुझे बेइंतहां दर्द हुआ

'इस सारे हंगामे, आश्‍चर्य, डर और घबराहट के बीच, एक बार अस्‍पताल में मैंने अपने बेटे से कहा, 'मैं इस वक्‍त अपने आप से बस यही उम्‍मीद करता था कि इस हालत में मैं इस संकट से न गुजरूं. मुझे किसी भी तरह अपने पैरों पर खड़े होना है। मैं डर और घरबाहट को खुद पर हावी नहीं होने दे सकता। यही मेरी मंशा थी... और तभी मुझे बेइंतहां दर्द हुआ। 

दुनिया में महज़ एक ही चीज निश्चित है वो अनिश्चि‍तता है

'जब मैं दर्द में, थका हुआ अस्‍पताल में घुस रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा अस्‍पताल लॉर्ड्स स्‍टेडियम के ठीक सामने है। यह मेरे बचपन के सपनों के 'मक्‍का' जैसा था. अपने दर्द के बीच, मैंने मुस्‍कुराते हुए विवियन रिचर्ड्स का पोस्‍टर देखा। इस हॉस्‍पिटल में मेरे वॉर्ड के ठीक ऊपर कोमा वॉर्ड है।

मैं अपने अस्‍पताल के कमरे की बालकॉनी में खड़ा था, और इसने मुझे हिला कर रख दिया। जिंदगी और मौत के खेल के बीच मात्र एक सड़क है। एक तरफ अस्‍पताल, एक तरफ स्‍टेडियम। मैं सिर्फ अपनी ताकत को महसूस कर सकता था और अपना खेल अच्‍छी तरह से खेलने की कोशिश कर सकता था.'

इस सब ने मुझे अहसास कराया कि मुझे परिणाम के बारे में सोचे बिना ही खुद को समर्पित करना चाहिए और विश्‍वास करना चाहिए, यह सोचा बिना कि मैं कहां जा रहा हूं, आज से 8 महीने, या आज से चार महीने, या दो साल. अब चिंताओं ने बैक सीट ले ली है और अब धुंधली से होने लगी हैं। पहली बार मैंने जीवन में महसूस किया है कि 'स्‍वतंत्रता' के असली मायने क्‍या हैं.'एक उपलब्धि का अहसास।

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया। उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया। वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल, मैं यही महसूस कर रहा हूं।

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग...सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं… एक बड़ी शक्ति… तीव्र जीवनधारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।

अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है… मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है।

अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो… जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

श्रद्धांजलि 

आज इरफान के निधन पर भारतीय सिनेमा जगत से लेकर अन्तरराष्ट्रीय सिनेमा जगत के लोग भी गमगीन हैं। इरफान सरल और स्पष्ट विचारों के व्यक्ति थे। जो जिंदगी को दिल खोल अलग तरीके से जीना चाहते थे।
उनके प्रशंसकों और साथियों के बीच उनकी काबिलियत, जज़्बे, मानवता और संघर्ष को लेकर चर्चा है। इरफान के अचनाक यूं विदा ले जाने से लोगों की जुबां पर दुख पसरा है। इरफान चाहे वास्तविक तौर पर यहां अब शायद मौजूद न हो लेकिन वो हमेशा लाखों करोड़ों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उनके किरदार हमेशा के लिए अमर हो गए। भारतीय सिनेमा जगत में उनकी निभाई भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता ।

फिल्म, थियेटर और स्मृतियों में इरफ़ान खान

अभिनेता इरफ़ान खान को श्रद्धांजलि 

सच में जब जिंदगी आपके हाथ में नींबू थमाती है तो शिकंजी बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है 

  • करिश्मा सिंह 

“सिर्फ इंसान गलत नहीं होते वक्त भी गलत हो सकता है।”29 अप्रैल की सुबह हजारों सिनेमा प्रेमियों को इसी गलत वक्त जैसी लगी जब पता चला कि बेहतरीन अभिनेता इरफान खान नहीं रहे। इस दुनिया में यदि कुछ शाश्वत है तो वह है मृत्यु लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा कष्ट और भय मृत्यु से ही होता है। दो साल पहले जब इरफान को एक खास किस्म की दुर्लभ बीमारी हुई तो उन्होनें अपने सोशल मीडिया पर लिखकर इसके बारे में बताया। 

अपनी आखिरी फिल्म "अंग्रेज़ी मीडियम" के ट्रेलर इंट्रो में वे कहते हैं- “हैलो भाईयों एवं बहनों, ये फिल्म अंग्रेज़ी मीडियम मेरे लिए बहुत खास है। सच, यकीन मानिये कि मेरी दिली इच्छा थी कि इस फिल्म को उतने ही प्यार से प्रमोट करूं जितने प्यार से हम लोगों ने इसे बनाया है। लेकिन मेरे शरीर के अंदर कुछ अनवांटेड मेहमान बैठे हुए हैं, उनसे वार्तालाप चल रहा है, देखते हैं किस करवट ऊंट बैठता है। जैसा भी होगा, आपको इत्तला कर दी जाएगी।"

इरफ़ान आगे कहते हैं- "कहावत है “when life gives you lemons make lemonade”, बोलने में अच्छा लगता है, पर सच में जब जिंदगी आपके हाथ में नींबू थमाती है तो शिकंजी बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन आपके पास और चॉयस भी क्या है, पॉजिटिव रहने के अलावा। फिलहाल, हाथ में नींबू की शिकंजी बना पाते हैं या नहीं बना पाते हैं. यह आप पर है।” और अंत में वे कहते हैं-“And Yes, wait for me।” यह सकारात्मकता ही इमरान को इतने बड़े अभिनेता के रूप में स्थापित करती है। 

अपने तीन दशक के करियर में उन्होनें 50 से अधिक राष्ट्रीय फिल्मों और धारावाहिकों में अभिनय किया है। अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में दि नेमसेक, स्लम डॉग मिलेनियर, लाइफ ऑफ पाई, दि अमेज़िंग स्पाइडरमैन, इनफैरनो प्रमुख हैं। सन 2011 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इतने कम समय में ही इरफान का नाम विशिष्ट कहे जाने वाले अभिनेताओं की श्रेणी में आ गया था। जाहिर है कि इसके पीछे जुनून और कड़ी मेहनत से इरफान का गहरा वास्ता रहा है। 

इरफ़ान ने 1988 में सलाम बॉम्बे नामक फिल्म से इस सफर की शुरुआत की थी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2003 में आयी फिल्म "हासिल" और 2004 में आयी "मकबूल" से उन्हें विशेष पहचान मिली। लाइफ
इन ए मेट्रो, दि लंचबॉक्स, पीकू, पान सिंह तोमर, हैदर, तलवार, हिन्दी मीडियम और 2020 में आयी अंग्रेज़ी मीडियम पिछले 2 दशकों में आयी महत्तवपूर्ण फिल्में हैं। आज उनके निधन पर प्रत्येक व्यक्ति उन्हें अपनी-अपनी तरह से श्रद्धांजलि दे रहा है। 

गीतकार वरूण ग्रोवर ने लिखा- “अब ये दिल दुबारा नहीं जुड़ेगा। शुक्रिया इरफान, अपनी जिंदगी माटी के घड़े में कच्ची सड़क किनारे रखने और उसमें अपनी कला का मीठा पानी भरते रहने के लिए। हम प्यासे राहगीर इसके बिना न कोई सफर पूरा कर पाते, न कर पाएंगे। जब कुछ नहीं रहता, तब भी पानी रहेगा। प्यार, नमन. जिंदाबाद। आने वाली नस्लें हमसे रश्क करेंगी कि हमने इरफान को देखा था।” 

किसी अभिनेता को पानी की उपमा देना कितना अलग और विशेष है। इरफान की फिल्में देखने पर वरूण की यह तुलना बिलकुल सटीक बैठने लगती है। सिनेमा में गीतकार, कथाकार, डायरेक्टर, सिनेमेटोग्राफर सबकी भूमिका विशेष होती है लेकिन ऐसा क्या है कि किसी कथाकार का लिखा किरदार परदे पर उतरते ही आपके मन के किसी कोने में जाकर बैठ जाता है और कुछ घंटों के लिए पर्दे पर जागृत रहने वाला वह किरदार हमेशा के लिए हमारे दिलों में अमर हो जाता है। वो क्या है जो पान सिंह तोमर की कहानी जब पर्दे पर आयी तो सबकी जुबां पर चढ़ गया “बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में।” 

बॉलीवुड की अक्सर इस आधार पर आलोचना होती है कि यह प्रेम के सिर्फ दिखावटी रूप को ही प्रदर्शित करता है, जो कि बहुत हद तक सही भी है लेकिन इरफान जैसे अभिनेता इस बने बनाये सांचे में फिट नहीं होते। शायद इसीलिए सहज प्रेम के कुछ अलग सांचे गढ़े जाते हैं और इरफान उन्हें पर्दे पर जी कर, हमारे दिलों में फिट कर
देते हैं। स्विटज़रलैंड की वादियों से इतर बनारस के घाट पर फिल्म पीकू में इरफान और दीपिका के उस शांत बैठने वाले दृश्य को जितनी बार याद करेंगे उतनी बार आपको प्रेम करने की मन करेगा। 

मध्य प्रदेश के बीहड़ों के बागियों और परिवार के चलते एक “चैंपियन से बागी” बनने का सफर उन्होनें इतनी गहराई से निभाया कि वे हम सबके दिलों में दाखिल हो गए। "दि लंच बॉक्स" में खाने और लंच बॉक्स के माध्यम से संचार और सहज इंसानी भावों को वे दर्शकों के सामने इतनी सहजता से निभाते हैं कि आप अपने आस-पास कहीं किसी लंच बॉक्स में ऐसी ही कहानी ढूढ़ने लग जाते हैं। फिल्म "कारवां" में गमगीन परिस्थिति में वे किसी आम व्यक्ति की तरह मदद करने की कोशिश करते हैं। वहीं "करीब-करीब सिंगल" में जिंदादिल आदमी का किरदार वे इतनी शिद्दत से निभाते हैं कि आप उनके फैन हो ही जाते हैं। रोमांस की कुछ अलग धारा को पर्दे पर अमर बनाने के लिए इरफान का शुक्रिया हम सब को करना ही चाहिए। 

अपने आखिरी पत्र में वे लिखते हैं “अनिश्चितता ही निश्चित है। जब मैं दर्द में, थका हुआ अस्पताल में घुस रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा अस्पताल लार्डस स्टेडियम के ठीक सामने है। यह मेरे बचपन के सपनों के मक्का जैसा था। अपने दर्द के बीच, मुस्कुराते हुए विवियन रिचर्डस का पोस्टर देखा। इस हॉस्पिटल में मेरे वॉर्ड के ठीक ऊपर कोमा वार्ड है। मैं अपने अस्पताल की के कमरे की बालकॉनी में खड़ा था और इसने मुझे हिलाकर रख दिया। दुनिया में बस एक ही चीज़ निश्चचित है “अनिश्चितता।” मैं सिर्फ अपनी ताकत को महसूस कर सकता था और अपना खेल अच्छी तरह से खेलने की कोशिश कर सकता था। इस सबने मुझे अहसास कराया कि परिणाम के बारे में सोचे बिना ही खुद को समर्पित कर देना चाहिए और विश्वास करना चाहिए, यह सोचे बिना कि मैं कहां जा रहा हूं. आज से 8 महीने पहले या दो साल। अब चिंताओं नें बैक सीट ले ली है और धुंधली होने लगी हैं। पहली बार मैने जीवन में महसूस किया है कि ‘स्वतंत्रता’ के असली मायने क्या हैं। ” 

इरफान का लिखा यह पत्र जीवन के प्रति उनके सकारात्मक रुख की बानगी भर है। इतनी दुर्लभ बीमारी से वे संपूर्ण ताकत से लड़े। आज भले ही वे इस दुनिया को छोड़ गए लेकिन प्रत्येक कला प्रेमी के हृदय में उनकी कला और स्मृतियां हर रोज़ धड़केंगी। कलाकार बनाए नहीं जाते, वे पैदा होते हैं। निश्चित ही, इरफान की कला एक दिन या महज कुछ सालों की नहीं थी बल्कि यह एक लंबी प्रक्रिया का सहज विकास था। पर्दे पर उन्हें देखते हुए जब आप खुद को उनसे जोड़ लेते हैं तो सहृदय हो जाते हैं। 

इतना बड़ा ओहदा उन्हें विरासत में नहीं मिला बल्कि यह उनकी अथाह मेहनत और लगन से हासिल किया हुआ सम्मान है। कुछ अलग मुद्दों पर अलग से अभिनय से इरफान ने अपनी विशेष पहचान बनायी है और आने वाली पीढ़ियां इस हस्ती की ओर गर्व से देखेंगी और वरूण ग्रोवर के शब्दों में हमसे रश्क करेंगी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, ऐसे में, रहमान फारिस साहब का एक शेर याद आता है: 

“कहानी खत्म हुयी और ऐसी खत्म हुयी
कि लोग रोने लगे तालियां बजाते हुए।” 

इरफान की तारीफ में बजने वाली तालियां कभी धीमी नहीं पड़ेंगी। उनकी कला, उनका चमकदार व्यक्तित्व हमेशा उनके प्रशंसकों के दिलों में आबाद रहेगा। ऐसे में, हैदर फिल्म में उनकी बोली पंक्तियां याद आती हैं: 

दरिया भी मैं 
दरख़्त भी मैं 
झेलम भी मैं 
चिनार भी मैं 
दैर भी हूं 
हराम भी हूं 
शिया भी हूं 
मैं हूं पण्डित 
मै था 
और मैं ही रहूँगा। 

कलाकार इरफ़ान भी हमारे साथ ही रहेंगे.  

"हासिल" के रणविजय सिंह उर्फ़ इरफ़ान खान को कौन भूल सकता है

अभिनेता इरफ़ान खान को श्रद्धांजलि 

हासिल से इरफान ने किया अभिनय का मुकाम हासिल 

  • गौरव तिवारी
सहसा विश्वास नहीं होता है. अपनी तरह के अनूठे और अकेले अभिनेता इरफ़ान खान चले गए. वे बीमार थे. एक मुश्किल कैंसर से जूझ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि वे इस लड़ाई को जीत जायेंगे. लेकिन जैसे परदे पर उनके अभिनय में कुछ भी निश्चित नहीं होता, वे अचानक चले गए. 

इस खबर के साथ ही फिल्म "हासिल" की याद हो आई. इलाहाबाद का होने और छात्र-राजनीति में दिलचस्पी होने के कारण मुझे सबसे पहले "हासिल" का रणविजय सिंह यानी इरफ़ान खान की ही याद आई. साल 2003 में आई इलाहाबादी तिग्मांशु धूलिया की सुपरहिट फिल्म "हासिल" का रणविजय सिंह भले ही पर्दे पर मर गया लेकिन वो किरदार आज भी हम जैसे लाखों दर्शकों के आंखों के सामने है। इसी किरदार से इरफान खान ने बॉलीवुड में अपनी अलग शख्सियत बनाई। 

एशिया के सबसे पुराने छात्रसंघ ( इलाहाबाद विश्वविद्यालय) की छात्र राजनीति पर बनी फ़िल्म हासिल में इरफान खान ने छात्रनेता (खलनायक) रणविजय सिंह का किरदार निभाया है। इलाहाबाद विवि के छात्रसंघ की राजनीति को 7 वर्ष तक लगातार जीने के बाद अपने अनुभव के आधार पर यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि रणविजय सिंह का किरदार इलाहाबाद विवि के छात्रनेताओं की वास्तविकता के बहुत करीब दिखता है। 

फ़िल्म के एक दृश्य में इरफान खान दौड़ते हुए बम बनाकर चला देते हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले एक छात्रनेता इलाहाबाद विवि के हॉलैंड हॉल हॉस्टल में रहते थे जिनकी कहानियां मैंने अपने सीनियरों से खूब सुनी हैं। इसके अलावा इस फिल्म में इरफान के बोलने का ढंग इलाहाबादी छात्रनेताओं से हूबहू मिलता है। कहते हैं कि अच्छा अभिनेता वाही होता है जो अपने किरदारों की खाल के अन्दर घुस जाए. इरफ़ान "हासिल" के रणविजय सिंह की खाल में घुस गए थे.  

फ़िल्म के एक दृश्य में वोट के लिए हॉस्टल में आरती घुमाने की प्रथा को मैंने खुद 2014 से 17 तक देखा है। आरती घुमाना इविवि के हॉस्टलों में सन 2017 तक चुनावी राजनीति और जातिवादी गोलबंदी एक प्रथा रही है।
इस प्रथा में हॉस्टल के कमरे-कमरे जाकर हॉस्टल के दबंग छात्रनेता आम छात्रों को आरती की थाली पर कसम दिलाते थे कि "मैं कसम खाता हूँ कि अमुक छात्रनेता को वोट दूंगा"। यह परंपरा मतदान होने की रात को निभाई जाती थी। 

फ़िल्म में रणविजय सिंह (इरफान खान) एक ऐसी लड़की को चाहने लगता है जो किसी और आम छात्र को चाहती है। रणविजय सिंह द्वारा उस छात्र को अपहरण कराकर बुलाने और धमकाने जैसा दृश्य इलाहाबाद की उस वास्तविक स्थिति को दर्शाता है जिसे मैंने खुद 2014 से 18 तक अनेकों बार देखा है। कहने की जरूरत नहीं है कि रणविजय सिंह के किरदार के लिए इरफान खान को 2004 में फिल्मफेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला था। 

अलविदा अभिनेता इरफ़ान ख़ान!

इरफान खान ने अपने बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत वर्ष 1998 में फ़िल्म 'सलाम बॉम्बे' से की थी। इसके अलावा उन्होंने आस्कर जीतनेवाली फ़िल्म "स्लमडॉग मिलियनेयर" (2008) में पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार भी निभाया था। "नॉक आउट" (2010), "बिल्लू बारबर" (2009), "पार्टीशन" (2007) जैसी फिल्मों से इरफान ने सिनेमा जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। 

लेकिन सच यह है कि 2003 में आई फ़िल्म "मकबूल" में मकबूल के किरदार में और 2003 में ही आई फ़िल्म "हासिल" में रणविजय सिंह के किरदार में इरफान खान ने अपने अभिनय का एवरेस्ट दिखा दिया था। 

इरफान पिछले साल (2019) लंदन से इलाज करवाकर लौटे थे और लौटने के बाद वो कोकिलाबेन अस्पताल के डॉक्टरों की देखरेख में ही ट्रीटमेंट और रुटीन चेकअप करवा रहे थे। फ़िल्म 'अंग्रेज़ी मीडियम' की शूटिंग के दौरान भी उनकी तबीयत बिगड़ जाया करती थी। हाल ही में इरफ़ान ख़ान की मां सईदा बेगम का जयपुर में निधन हो गया। लॉकडाउन की वजह से इरफ़ान अपनी मां की अंतिम यात्रा में शरीक नहीं हो पाए थे और वीडियो कॉल के ज़रिए ही उन्होंने मां के जनाज़े में श‍िरकत की थी। 

अफ़सोस मां की मृत्यु के सिर्फ चार दिन बाद ही हरफ़नमौला अभिनेता इरफान खान का आज बुधवार (29 अप्रैल 2020) को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में 54 वर्ष की उम्र निधन हो गया। इरफान 2018 से न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (एक विशेष प्रकार का कैंसर) नामक बीमारी से जूझ रहे थे। उन्हें मंगलवार को कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 

इरफान ने ट्वीट करके खुद अपनी बीमारी के बारे में बताया था। उन्होंने ट्वीट किया था कि "ज़िंदगी में अचानक कुछ ऐसा हो जाता है, जो आपको आगे लेकर जाता है। मेरी ज़िंदगी के पिछले कुछ दिन ऐसे ही रहे हैं। मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर नामक बीमारी हुई है लेकिन मेरे आसपास मौजूद लोगों के प्यार और ताक़त ने मुझमें उम्मीद जगाई है।" बीमारी के बारे में पता चलते ही इरफ़ान ख़ान इलाज के लिए लंदन चले गए थे। इरफ़ान वहां क़रीब एक साल रहे और फिर मार्च 2019 में भारत लौटे थे। 

कलाकार इरफ़ान खान की जीवन यात्रा 

इरफ़ान खान का पूरा नाम इरफ़ान अली खान था। इरफ़ान का जन्म 7 जनवरी 1967 को जयपुर (राजस्थान) में हुआ था। इरफान ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 23 फरवरी 1995 को इरफान ने कलाकार और नाट्यकर्मी सुतपा सिकंदर से शादी की थी। इरफान के दो बेटे बाबिल खान और अयान खान हैं। 

इरफ़ान की कई फिल्में हैं जिसमें उन्होंने शानदार अभिनय किया है. 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में इरफ़ान खान को फिल्म "पान सिंह तोमर" में अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था। 2008 में इरफान को फ़िल्म "लाइफ इन ए मेट्रो" के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने इरफान खान को 2011 में अभिनय के क्षेत्र में 'पद्म पुरस्कार' से सम्मानित किया। 

इरफान बालीवुड की 30 से ज्यादा फिल्मों मे अभिनय कर चुके हैं। इरफान ने हॉलीवुड में भी ए माइटी हार्ट, स्लमडॉग मिलियनेयर और द अमेजिंग स्पाइडर मैन जैसी फिल्मों में भी काम करके अपनी अलग पहचान बनाई। इरफान ने फिल्मों के अलावा धारावाहिकों में भी काम किया। इरफान ने 1994 में सीरियल 'द ग्रेट मराठा नजीबुद्दौला' में रोहिल्ला सरदार और 1992 में सीरियल 'चाणक्य' में सेनापति भद्रसाल का किरदार निभाया था। 

लेकिन "हासिल", "पान सिंह तोमर" के अलावा "पीकू", "लंचबाक्स", "हिंदी मीडियम", "करीब-करीब सिंगल", "नेमसेक", "लाईफ आफ पाई" "हैदर" और "तलवार" जैसी कई फिल्मों में उनका अभिनय हमेशा याद किया जाएगा. 

फिल्म अभिनेत्री स्मिता पाटिल की तरह इरफ़ान भी उस समय चले गए जब वे अपने अभिनय के उरूज पर थे और उनका सबसे बेहतर काम आना बाकी था. सचमुच, उन्हें भुलाना मुश्किल होगा.  

Tuesday, 28 April 2020

कश्मीर के हालात, एक कश्मीरी पत्रकार की नज़र से

पुस्तक समीक्षा

लेकिन यह किताब कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन और उनकी बदहाली की चर्चा नहीं करती है 
  • आशुतोष तिवारी 
चेहरों के, दिलों के ये पत्थर, ये जलते घर
बर्बादी के सारे मंजर, सब तेरे नगर सब मेरे नगर, ये कहते हैं
इस सरहद पर फुफकारेगा कब तक नफरत का ये अजगर
हम अपने अपने खेतो में, गेहूँ की जगह चावल की जगह
ये बन्दूके क्यों बोते हैं
जब दोनों ही की गलियों में, कुछ भूखे बच्चे रोते हैं। 
--जावेद अख्तर

श्मीर के हालात पर साल 2008 में कश्मीरी पत्रकार बशारत पीर की लिखी एक किताब आई थी- "कर्फ्यूड नाईट, मेमॉयर ऑफ वॉर इन कश्मीर।" इस किताब को उसी साल नॉन-फिक्शन कैटेगरी में क्रॉसवर्ड पुरस्कार भी मिला। लेखक बशारत पीर रेडिफ और तहलका पत्रिका में काम कर चुके हैं और फिलहाल, न्यूयॉर्क में रहते हुए 'दी न्यूयॉर्क टाइम्स’ के लिए काम कर रहे हैं। 

यह किताब भारत के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर के बिगड़ते हालात का चित्रण है। इसमें अलगाववादियों और भारतीय सुरक्षा बलों के बीच के टकराव और हिंसा से कश्मीरियों को होने वाले दर्द और नुकसान की कहानी है। क़रीब चार दशकों की लगातार हिंसा से कश्मीरी जनजीवन, संस्कृति और युवाओं का भविष्य किस तरह नष्ट होता रहा है, इसका वर्णन इस किताब में किया गया है। हालाँकि इस किताब में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन की त्रासद घटना के बारे में कोई खास जिक्र नहीं है और उनकी मुश्किलों को लगभग अनदेखा कर दिया गया है. 

किताब की शुरुआत एक आत्मकथा की तरह होती है जिसमें लेखक ने अपने स्कूली समय में कश्मीरियों के अंदर भारत को लेकर बनती अवधारणा दिखाई है। वे अपने ही देश के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। लेखक खुद 14 साल की उम्र में अलगाववादियों से प्रेरित होकर जेकेएलएफ (जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) से जुड़ना चाहता है लेकिन उनका परिवार उन्हें समझा कर हॉस्टल से वापिस घर बुला लेता है। 

बाद में लेखक को तब गहरा झटका लगता है जब उनका एक चचेरा भाई अलगाववादी गुट से जुड़ जाता है और कुछ महीनों में ही सेना से हुए मुठभेड़ में मारा जाता है। इसके बाद लेखक को आगे की पढ़ाई के लिए कश्मीर से बाहर भेजा दिया जाता है। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़कर दिल्ली में ही पत्रकारिता करने लगते हैं। 

लेकिन तभी साल 2001 में भारतीय संसद पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला होता है जिसमें कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के हाथ होने की पुष्टि होती है। इसके बाद लेखक तय करता है कि वह कश्मीर जाकर हालात का जायज़ा लेगा और उस पर लिखेगा। कश्मीर जाने के बाद लेखक को कई तरह की कहानियाँ पता चलती हैं जो आम कश्मीरी, सुरक्षा बलों और अलगाववादियों के बीच हुई घटनाएँ हैं लेखक बताते हैं कि आम कश्मीरी ना सिर्फ़ सुरक्षा बलों बल्कि अलगाववादियों की नज़र में भी शक के घेरे में रहते हैं। कई लोगों को अलगाववाद समर्थक आतंकवादियों ने सेना का जासूस और भारतीय समर्थक होने के शक में मौत के घाट उतार दिया। 

यह किताब हमें राजनीति और हिंसा की उस कड़वी सच्चाई से सामना करवाती है जिसमें नेताओं के स्वार्थी अहंकार के कारण आम लोगों की ज़िंदगी तबाह हो जाती है। लेखक ने एक ऐसे इंसान की कहानी का भी ज़िक्र किया है जिसने अलगाववादियों का साथ दिया लेकिन जब उसे मदद की ज़रूरत पड़ी तब उसे दुत्कार दिया गया। वह आदमी कहता है कि अलगाववादी नेताओं के पास आलीशान बंगले और गाड़ियाँ हैं और वे गरीबों को बन्दूक थमाकर उन्हें मौत की ओर धकेल रहे हैं।

यह किताब आपको कश्मीर के भटके युवाओं के बारे में भी बताएगी। किस तरह एके-47 थामना और अलगाववादियों का पहनावा वहाँ के युवाओं के लिए फैशन बन जाता है। लेखक ने कश्मीर की शिक्षा व्यवस्था के ख़राब हालात पर भी रोशनी डाली है। 

एक और महत्वपूर्ण बात इस किताब में उठाई गई है और वह है कश्मीर के भटके नौजवानों का इस्लामीकरण और पाकिस्तानीकरण। जहाँ 80 के दशक में जेकेएलएफ कश्मीर को आज़ाद करने का लक्ष्य लिए हुए था, वहीं 90 के दशक की शुरुआत के साथ ही जेकेएलएफ की जगह हिजबुल मुजाहिदीन का प्रभुत्व कश्मीर में बढ़ गया, जो कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहता है।प्रख्यात पत्रकार खुशवंत सिंह ने इस किताब के बारे में कहा था कि आज़ादी के समय जिस कश्मीर ने मुस्लिम पाकिस्तान की जगह सेक्युलर भारत को चुना, आज वहाँ हिंसा क्यों है, इसका कारण जानने के लिए इस किताब को पढ़ें। 

कुल मिलाकर लेखक ने कश्मीर के अंदरूनी हालात का इस किताब में बहुत मार्मिक चित्रण किया है। लेकिन कश्मीरी पंडितों की तकलीफों का विस्तार से उल्लेख न होना खटकता है.  

लेखक: बशारत पीर 
किताब: कर्फ्यूड नाईट मेमॉयर ऑफ वॉर इन कश्मीर

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